एक पल रुकिए और खुद महसूस कीजिए —
- दो उँगलियाँ हल्के से अपने गले पर रखिए और बोलिए: “आआआआ…” — कुछ काँपता हुआ महसूस होता है।
- अब बोलना बंद कर दीजिए — वह काँपना भी रुक जाता है।
- किसी डिब्बे या ढोल पर हाथ रखकर उसे बजाइए — हथेली पर हल्की झनझनाहट महसूस होती है।
इन तीनों में एक ही राज़ छिपा है — और वही बताएगा कि आवाज़ बनती कहाँ है और हमारे कान तक पहुँचती कैसे है।
हम दिन भर कितनी सारी आवाज़ें सुनते हैं — बोलना, गाना, ढोल, हॉर्न, चिड़ियों की चहचहाहट। सुनते हम कान से हैं। पर आवाज़ आखिर बनती कहाँ है, और हमसे दूर बनी आवाज़ हमारे कान तक पहुँचती कैसे है? आइए एक-एक कदम खोलते हैं।
जब हम बोलते हैं तब हमारा गला हल्का-हल्का काँपता है। किसी चीज़ के इसी तेज़ी से आगे-पीछे काँपने को कंपन (vibration) कहते हैं। मज़े की बात — बोलना बंद करते ही कंपन (vibration) रुक जाता है, और उसके साथ आवाज़ भी बंद हो जाती है।
ढोल पर हाथ मारते ही उसकी चमड़ी में कंपन (vibration) होता है। यही कंपन (vibration) आसपास की हवा (air) में भी कंपन (vibration) पैदा कर देता है, और वह हवा के रास्ते हमारे कान तक पहुँच जाता है।
आवाज़ का पूरा सफ़र: ढोल की चमड़ी काँपती है → हवा के कण कंपन (vibration) करते हैं → कंपन (vibration) कान तक पहुँचता है → कान और दिमाग उसे आवाज़ मानते हैं। साथ में पत्थर, घंटी और लकड़ी के उदाहरण, और अगर कंपन (vibration) न हो तो क्या होगा।
एक बहुत ज़रूरी बात — हवा में “आवाज़” कोई उड़ती हुई चीज़ बनकर नहीं आती। हवा में तो सिर्फ़ कंपन (vibration) यात्रा करता है। जब यह कंपन (vibration) हमारे कान तक पहुँचता है, तब हमारा कान और मस्तिष्क (brain) मिलकर उसे आवाज़ (sound) के रूप में महसूस करते हैं।
किसी पत्थर को जूते से हल्का-सा ठोकिए। “ठक!” — एक आवाज़ आती है। पर पत्थर तो हिलता हुआ भी नहीं दिखता, फिर आवाज़ कहाँ से आई?
क्या पत्थर भी काँपा? हाँ! यह कंपन (vibration) इतना छोटा होता है कि हम उसे आँखों से देख नहीं पाते। पर पत्थर और जूते, दोनों में हल्का कंपन (vibration) पैदा होता है, जो आसपास की हवा (air) में फैलकर हमारे कान तक पहुँच जाता है।
तो कोई आवाज़ नहीं होगी। यानी आवाज़ के लिए कहीं न कहीं कंपन (vibration) का पैदा होना ज़रूरी है — बिना कंपन (vibration) के आवाज़ बन ही नहीं सकती।
हम कण सिद्धांत (kinetic theory) में सीख चुके हैं कि हवा (air) बहुत छोटे-छोटे कणों से बनी है। ढोल की चमड़ी काँपती है तो वह अपने पास के हवा के कणों को धक्का देती है। वे कण अपने अगले कणों को धक्का देते हैं, वे उनसे अगले को — इस तरह कंपन (vibration) एक कण से दूसरे कण तक होते हुए आगे बढ़ता जाता है।
यह समझना ज़रूरी है — हवा के कण ढोल से चलकर हमारे कान तक नहीं आते। हर कण बस अपनी जगह के आसपास ही थोड़ा आगे-पीछे होता है और कंपन (vibration) को अगले कण तक पहुँचा देता है। जैसे कतार में खड़े लोग एक-दूसरे को हल्का धक्का पास कर दें, पर अपनी जगह से हटें नहीं — धक्का आगे पहुँच जाता है, लोग वहीं रहते हैं।
कण से कण तक जो धक्का इस तरह आगे बढ़ता जाता है, उसे तरंग (wave) कहते हैं। तरंग (wave) कोई चीज़ नहीं है जो सफ़र करती है — यह सिर्फ़ कंपन (vibration) का पैटर्न है, जो एक कण से दूसरे कण को धक्का देते हुए आगे बढ़ता है। आवाज़ भी असल में एक तरंग (wave) है — इसे ध्वनि तरंग (sound wave) कहते हैं। जो कंपन (vibration) करता है वह जगह से नहीं हिलता, पर जो तरंग (wave) आगे बढ़ती है, वह दूर तक पहुँच जाती है — ठीक वैसे ही जैसे कतार में धक्का आगे बढ़ा, पर लोग अपनी जगह पर ही रहे।
हवा (air) में कण हैं, पानी (water) में कण हैं, और पत्थर व लकड़ी जैसे ठोस (solid) पदार्थ (matter) में भी कण हैं। तो क्या कंपन (vibration) इन सबसे होकर हमारे कान तक पहुँच सकता है? हाँ! हवा से भी, पानी से भी, और ठोस (solid) से भी आवाज़ गुज़र सकती है।
जिस पदार्थ (matter) के कणों के ज़रिए कंपन (vibration) आगे बढ़ता है, उसे माध्यम (medium) कहते हैं। हवा, पानी और ठोस (solid) — तीनों आवाज़ के लिए माध्यम (medium) का काम करते हैं।
ज़रा अंदाज़ा लगाइए — हवा, पानी और ठोस (solid) में से कंपन (vibration) सबसे आसानी से किसमें आगे बढ़ेगा? आमतौर पर ठोस (solid) में आवाज़ सबसे तेज़ चलती है, पानी में उससे धीमी, और हवा जैसी गैस (gas) में सबसे धीमी। इसका कारण कणों की दूरी है — ठोस (solid) में कण सबसे पास-पास होते हैं, इसलिए धक्का यानी कंपन (vibration) झट से अगले कण तक पहुँच जाता है।
आवाज़ तीनों माध्यम (medium) में एक जैसे तरीके से चलती है — कण आगे के कण को धक्का देते हैं, वे अगले को, और कंपन (vibration) आगे बढ़ता जाता है — चाहे हवा (air) हो, पानी (water) हो या ठोस (solid)।
अपना कान मेज़ पर टिकाइए और किसी से मेज़ के दूसरे छोर पर उँगली से हल्की खटखट करवाइए। फिर कान उठाकर वही खटखट हवा से सुनिए। मेज़ (एक ठोस) से आती आवाज़ अक्सर ज़्यादा साफ़ और तेज़ सुनाई देती है।
अब ज़रा सोचिए — अगर ढोल और हमारे कान के बीच कोई पदार्थ (matter) हो ही नहीं, न हवा, न पानी, न कोई ठोस (solid), तो कंपन (vibration) आगे कैसे बढ़ेगा? नहीं बढ़ पाएगा।
जहाँ पदार्थ (matter) के कण लगभग होते ही नहीं, ऐसी जगह को निर्वात (vacuum) कहते हैं। अंतरिक्ष (space) का बहुत बड़ा हिस्सा लगभग निर्वात (vacuum) है।
यहीं एक बहुत सुंदर बात सामने आती है। अंतरिक्ष (space) में सूरज का प्रकाश (light) तो हम तक पहुँच जाता है, पर वहाँ की कोई आवाज़ हम तक नहीं पहुँच सकती। कारण? प्रकाश (light) को चलने के लिए किसी माध्यम (medium) की ज़रूरत नहीं होती, पर आवाज़ को चलने के लिए हमेशा कोई माध्यम (medium) चाहिए।
दीवार के पीछे खड़ा कोई व्यक्ति हमें दिखाई नहीं देता, फिर भी उसकी आवाज़ हमें सुनाई दे सकती है। ऐसा क्यों?
रोशनी (light) के पाठ में हमने सीखा था कि प्रकाश (light) आमतौर पर सीधी रेखा में चलता है। दीवार उसका रास्ता रोक देती है, इसलिए पीछे खड़ा व्यक्ति दिखाई नहीं देता।
पर ध्वनि तरंग (sound wave) थोड़े अलग तरह से फैलती है — वह दरवाज़े, कोने और दीवार के किनारों के आसपास मुड़कर दूसरी ओर भी पहुँच सकती है। तरंग (wave) के इसी किनारों के आसपास मुड़कर फैलने को विवर्तन (diffraction) कहते हैं।
ध्वनि (sound) चारों दिशाओं में फैलती है और दीवार के ऊपर, नीचे व किनारों से मुड़कर दूसरी ओर पहुँच जाती है — इसे विवर्तन (diffraction) कहते हैं। रोशनी (light) सीधी रेखा में चलती है, इसलिए दीवार से रुक जाती है।
इसीलिए कमरे के बाहर खड़ा व्यक्ति दिखता तो नहीं, फिर भी आप पहचान लेते हैं — “अरे, यह तो रवि की आवाज़ है!” अगर आवाज़ भी प्रकाश (light) की तरह सिर्फ़ सीधी दिशा में चलती, तो शायद हम उसे सुन ही न पाते।
पूरा पाठ — एक नज़र में: आवाज़ कैसे बनती है, कैसे चलती है, कहाँ रुक जाती है, और कैसे मुड़ जाती है।
1आवाज़ आखिर बनती कैसे है?▾
2बोलना बंद करते ही आवाज़ क्यों रुक जाती है?▾
3पत्थर हिलता हुआ नहीं दिखता, फिर ठोकर से आवाज़ कैसे?▾
4क्या हवा के कण ढोल से उड़कर हमारे कान तक आते हैं?▾
5कण से कण तक बढ़ते हुए इस धक्के को क्या कहते हैं?▾
6आवाज़ हवा, पानी और ठोस — किसमें सबसे तेज़ चलती है, और क्यों?▾
7जिस चीज़ से होकर आवाज़ चलती है, उसे क्या कहते हैं?▾
8अंतरिक्ष में यात्री बिना यंत्र के एक-दूसरे की आवाज़ क्यों नहीं सुन पाते?▾
9दीवार के पीछे का व्यक्ति दिखता नहीं, पर सुनाई देता है — क्यों?▾
आवाज़ की कहानी — बड़ी बातें
1. हर आवाज़ के पीछे कहीं न कहीं कंपन (vibration) होता है, और यह बढ़ता हुआ कंपन (vibration) कण से कण को धक्का देते हुए तरंग (wave) के रूप में आगे बढ़ता है — कण खुद नहीं चलते।
2. आवाज़ को चलने के लिए एक माध्यम (medium) चाहिए — हवा, पानी या ठोस (solid)। कण जितने पास-पास, आवाज़ उतनी तेज़; इसीलिए निर्वात (vacuum) में आवाज़ नहीं चलती।
3. आवाज़ किनारों के आसपास मुड़ भी जाती है — विवर्तन (diffraction) — इसलिए ओट में छिपे व्यक्ति की आवाज़ भी हम तक पहुँच जाती है।
और यहीं प्रकाश (light) से एक सुंदर फ़र्क दिखता है: प्रकाश (light) सीधा चलता है और माध्यम (medium) के बिना भी चल लेता है; जबकि आवाज़ मुड़ भी जाती है, पर माध्यम (medium) के बिना चल ही नहीं सकती।