एक पल रुकिए और सोचिए —
- तीन कटोरे: एक में गरम पानी, एक में ठंडा, एक में गुनगुना। दोनों हाथ बाद में गुनगुने वाले में डालिए — क्या एक ही पानी दोनों को एक जैसा लगेगा?
- चाय में रखा चम्मच बाहर वाले सिरे से भी गरम क्यों हो जाता है?
- स्वेटर हमें गरम रखता है — पर स्वेटर खुद तो गरम नहीं होता। फिर वह करता क्या है?
तीनों सवाल एक ही जगह ले जाते हैं — गर्मी असल में है क्या।
हम रोज़ कहते हैं "आज गरमी है" या "पानी ठंडा है"। पर गरम और ठंडा होता क्या है? और क्या हमारा हाथ इसे ठीक-ठीक बता भी पाता है?
तीन कटोरे रखिए — एक में गरम पानी (छूने लायक, बहुत गरम नहीं), एक में ठंडा, और एक में गुनगुना। एक हाथ गरम में और दूसरा ठंडे में एक मिनट रखिए। अब दोनों हाथ एक साथ गुनगुने वाले कटोरे में डालिए।
वही एक पानी एक हाथ को ठंडा लगेगा और दूसरे को गरम। हमारा हाथ तापमान (temperature) नापता नहीं — वह सिर्फ़ बदलाव महसूस करता है।
गरम पानी से आया हाथ अब गर्मी खो रहा है, इसलिए उसे ठंडा लगा। ठंडे पानी से आया हाथ गर्मी ले रहा है, इसलिए उसे गरम लगा।
एक ही पानी, दो अलग जवाब — इसीलिए हाथ से नापना काम नहीं आता।
इसीलिए थर्मामीटर (thermometer) बनाया गया। वह किसी के एहसास पर नहीं, एक तय पैमाने पर नापता है। इसी नाप को तापमान (temperature) कहते हैं।
पानी 0 पर जमता है, 100 पर उबलता है, और हमारा शरीर बीच में लगभग 37 पर रहता है।
हर चीज़ बहुत छोटे-छोटे कणों से बनी है — यह हमने कण सिद्धांत (particle theory) वाले पाठ में देखा था। और ये कण कभी शांत नहीं बैठते। वे हमेशा हिलते-डुलते रहते हैं।
गर्मी इन्हीं कणों की हलचल है। चीज़ गरम होती है तो उसके कण तेज़ हिलने लगते हैं; ठंडी होती है तो धीरे।
गरम और ठंडा किसी चीज़ के अंदर भरे नहीं होते — वे कणों की रफ़्तार का नाम हैं।
इसीलिए हाथ रगड़ने से हथेली गरम हो जाती है — रगड़ने से कणों की हलचल बढ़ जाती है।
पिछले पाठ में एक सवाल अधूरा छूट गया था: गरम हवा हल्की होकर ऊपर क्यों उठ जाती है? अब जवाब आसान है।
गरम होते ही हवा के कण तेज़ हिलने लगते हैं और एक-दूसरे को दूर धकेल देते हैं। उतनी ही जगह में अब कम कण बचते हैं — इसलिए वह हवा हल्की हो जाती है।
दोनों डिब्बे बराबर हैं। गरम वाले में कण दूर-दूर हो गए, इसलिए वह हवा हल्की है।
हल्की हवा को नीचे से भारी ठंडी हवा ऊपर धकेल देती है। यही गरम हवा के गुब्बारे को उठाती है, यही धुएँ को ऊपर ले जाती है, और यही हवा चलने की वजह बनती है।
गरम चाय में स्टील का चम्मच रखिए। एक मिनट बाद उसका बाहर वाला सिरा छूकर देखिए — वह भी गरम हो चुका होगा, हालाँकि वह चाय में था ही नहीं।
गर्मी हमेशा गरम चीज़ से ठंडी चीज़ की तरफ़ बहती है — कभी उल्टा नहीं।
चाय के तेज़ हिलते कण चम्मच के शांत कणों को धक्का देते हैं। वे कण अपने अगले पड़ोसियों को हिलाते हैं। इस तरह हलचल एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँच जाती है।
चम्मच का दूर वाला सिरा भी गरम हो जाता है — हलचल कण-दर-कण आगे बढ़ती है।
गर्मी तीन तरीक़ों से चलती है: छूने से (चाय से चम्मच तक), बहने से (गरम हवा या पानी का ऊपर उठना), और सीधे किरणों से (धूप, या अंगीठी की आँच जो बिना छुए भी लगती है)।
और "ठंड लगना" कोई अलग चीज़ नहीं है। ठंड तब लगती है जब हमारे शरीर की गर्मी बाहर निकल रही होती है।
कण तेज़ हिलेंगे तो उन्हें ज़्यादा जगह चाहिए। इसीलिए ज़्यादातर चीज़ें गरम होकर थोड़ी फैल जाती हैं और ठंडी होकर सिकुड़ जाती हैं।
काँच की बरनी का धातु वाला ढक्कन कसकर फँसा हो, तो थोड़ी देर उस पर गरम पानी डालिए। फिर खोलिए — ढक्कन आसानी से घूम जाएगा।
गरम होकर धातु का ढक्कन थोड़ा फैल गया और ढीला पड़ गया।
पटरियों के बीच छोटी जगहें जान-बूझकर छोड़ी जाती हैं, ताकि गर्मी में फैलने की गुंजाइश रहे।
थर्मामीटर (thermometer) भी इसी बात पर चलता है: अंदर का तरल गरम होकर फैलता है और पतली नली में ऊपर चढ़ जाता है।
कणों को और गर्मी दीजिए, तो वे और तेज़ हिलेंगे। एक हद के बाद वे एक-दूसरे की पकड़ से छूट जाते हैं।
तब चीज़ का रूप ही बदल जाता है — बर्फ़ पिघलकर पानी बन जाती है, और पानी उबलकर भाप।
चीज़ वही रहती है — सिर्फ़ कणों की हलचल और पकड़ बदलती है।
ठंडा कीजिए तो सब उल्टा हो जाता है: भाप ठंडी होकर पानी बनती है, पानी जमकर बर्फ़।
गर्मी में शरीर पसीना निकालता है। पसीना सूखते समय शरीर से गर्मी अपने साथ ले जाता है — इसीलिए बाद में ठंडक महसूस होती है।
इसीलिए पंखे के नीचे राहत मिलती है। पंखा हवा को ठंडा नहीं करता — वह बस पसीने को जल्दी सुखा देता है।
ठंड में शरीर काँपने लगता है। काँपना मांसपेशियों (muscles) की तेज़ हलचल है, और हलचल से गर्मी बनती है — शरीर खुद को गरम करने की कोशिश कर रहा होता है।
और स्वेटर? ऊन खुद गर्मी नहीं देती — वह अपने रेशों के बीच हवा को फँसा लेती है। वही फँसी हुई हवा शरीर की गर्मी को बाहर जाने से रोकती है। यानी स्वेटर असल में हवा से काम चलाता है।
पूरा पाठ — एक नज़र में: गर्मी कोई चीज़ नहीं, हलचल है — और वह हमेशा गरम से ठंडे की तरफ़ जाती है।
1एक ही गुनगुना पानी दो हाथों को अलग-अलग क्यों लगता है?▾
2गर्मी असल में है क्या?▾
3गरम हवा हल्की क्यों हो जाती है?▾
4चाय में रखा चम्मच बाहरी सिरे से भी गरम क्यों हो जाता है?▾
5क्या ठंड कोई चीज़ है जो हमारे अंदर आती है?▾
6फँसे हुए ढक्कन पर गरम पानी डालने से वह क्यों खुल जाता है?▾
7रेल की पटरियों के बीच जगह क्यों छोड़ी जाती है?▾
8बर्फ़ से पानी और पानी से भाप बनते समय क्या बदलता है?▾
9पंखा हवा को ठंडा करता है या कुछ और?▾
10स्वेटर हमें गरम कैसे रखता है?▾
गर्मी की कहानी — बड़ी बातें
1. गर्मी कोई चीज़ नहीं है जो अंदर भरी हो। वह कणों की हलचल है — गरम यानी तेज़, ठंडा यानी धीरे।
2. हमारा हाथ तापमान (temperature) नहीं नापता, सिर्फ़ बदलाव महसूस करता है। इसीलिए थर्मामीटर (thermometer) चाहिए।
3. गर्मी हमेशा गरम से ठंडे की तरफ़ बहती है — कभी उल्टा नहीं। ठंड लगना अपनी गर्मी खोने का नाम है।
4. थोड़ी गर्मी से चीज़ें फैलती हैं; ज़्यादा गर्मी से उनका रूप ही बदल जाता है।
और यह सबसे सुंदर बात: जिस चीज़ को हम "गरमी" कहते हैं, वह असल में लाखों छोटे-छोटे कणों का न रुकने वाला नाच है। हम उसे देख नहीं सकते — बस महसूस कर सकते हैं।