एक पल रुकिए और सोचिए —
- एक बीज और एक कंकड़ — दोनों ज़मीन पर पड़े हैं। एक हफ़्ते बाद क्या फ़र्क़ होगा?
- पेड़ अपनी जगह से हिलता तक नहीं, फिर भी ज़िंदा है। नदी लगातार बहती रहती है, फिर भी नहीं। तो पहचान क्या है?
- और आपके अपने शरीर में जो कुछ है — वह आया कहाँ से?
ज़िंदा और निर्जीव का फ़र्क़ बताना आसान लगता है — जब तक आप ग़ौर से न सोचें।
नीचे सात चीज़ें हैं। हर एक पर पहले खुद सोचिए — यह ज़िंदा है या नहीं, और आपने ऐसा क्यों सोचा।
फिर जवाब खोलिए। शुरू की चीज़ें आसान हैं, आगे मुश्किल होती जाएँगी।
1कुत्ता▾
2पत्थर▾
3पेड़▾
4बहती नदी▾
5बीज▾
6सूखा पत्ता▾
7आग▾
इन सात सवालों से एक बात साफ़ हो गई: कोई एक पहचान अकेले काम नहीं करती। न हिलना, न बढ़ना, न ख़त्म होना।
वैज्ञानिक ज़िंदा चीज़ों में सात बातें गिनते हैं:
- वे अपने आसपास से खाना लेती हैं
- वे साँस लेती हैं
- वे बढ़ती हैं
- वे कचरा बाहर निकालती हैं
- वे महसूस करती हैं और जवाब देती हैं
- वे अपने जैसे नए जीव बनाती हैं
- और एक दिन वे मर जाती हैं
आज तक कोई ऐसी निर्जीव चीज़ नहीं मिली जो ये सातों काम करती हो।
पर उल्टा सच नहीं है। बहुत-से ज़िंदा जीव इनमें से एक या दो काम नहीं करते।
- सोया हुआ बीज इनमें से लगभग कुछ नहीं करता — फिर भी ज़िंदा है
- पेड़ अपनी जगह से हिलता तक नहीं
- बड़ा हो चुका इंसान अब बढ़ता नहीं
इन सातों में दो बातें सबसे गहरी हैं।
एक ज़िंदा चीज़ अपने आप नहीं चलती। उसे बाहर से कुछ लेना ही पड़ता है — हर दिन, ज़िंदगी भर।
और जो वह लेती है, वही उसका शरीर बन जाता है।
एक बीज मिट्टी, पानी और हवा खींचता है — और उन्हीं से एक पूरा पेड़ खड़ा कर देता है। जो कल मिट्टी थी, वह आज तना और पत्ता है।
आप भी वही हैं। आपका शरीर उन चीज़ों से बना है जो कभी खेत में उगी थीं।
कोई निर्जीव चीज़ अपने जैसा दूसरा नहीं बनाती। पत्थर से पत्थर नहीं निकलते।
पर हर ज़िंदा चीज़ अपनी ज़िंदगी में एक बार यह करती है।
- कुछ जीव यह अकेले कर लेते हैं — जैसे बहुत छोटे जीव, जो खुद के दो टुकड़े कर लेते हैं
- कुछ को इसके लिए दो चाहिए — नर और मादा, जैसे ज़्यादातर जानवर और बहुत-से पौधे
और नक़ल भी कैसी सटीक। आम की गुठली से आम ही उगेगा, नीम नहीं। कुत्ते के बच्चे कुत्ते ही होंगे।
ज़िंदा होने की दो सबसे गहरी पहचानें — बाकी सब इन्हीं से निकलता है।
- बढ़ना — जो लिया गया, वह शरीर में जुड़ता चला जाता है
- साँस लेना — लिए हुए खाने से ऊर्जा निकालने का तरीका
- कचरा निकालना — लेने के बाद जो बचता है, उसे बाहर करना पड़ता है
- महसूस करना और जवाब देना — खाना कहाँ है और ख़तरा कहाँ है, यह जानने के लिए
- मरना — एक दिन शरीर खुद को सँभालना बंद कर देता है
आग बहुत कुछ ज़िंदा जैसी लगती है। वह खाती है, बढ़ती है, हवा लेती है, फैलती है, और आख़िर में बुझ जाती है।
पर दोनों बड़ी बातों पर उसे परखिए।
- आग खाती ज़रूर है — पर जो खाती है, वह उसका शरीर नहीं बनता। लकड़ी राख और गैस बनकर बिखर जाती है।
- आग फैलती ज़रूर है — पर वह अपने जैसा कुछ बनाती नहीं। नई आग की शक्ल लकड़ी तय करती है, पुरानी आग नहीं।
दोनों कुछ लेते हैं — पर सिर्फ़ एक उससे अपना शरीर बनाता है।
आग ज़िंदा नहीं है।
हर ज़िंदा शरीर छोटे-छोटे खानों से बना है। इन्हें कोशिका (cell) कहते हैं।
- पत्ते को बहुत बड़ा करके देखें तो वह ईंटों की दीवार जैसा दिखता है
- हमारी खाल, खून, हड्डी, माँस — सब कोशिकाओं (cells) से बने हैं
- कोशिकाएँ (cells) इतनी छोटी हैं कि खाली आँख से दिखती ही नहीं
हर ज़िंदा शरीर इन्हीं छोटे खानों को जोड़-जोड़कर बना है।
तालाब के पानी की एक बूँद में ऐसे हज़ारों जीव हो सकते हैं, जिनका पूरा शरीर एक ही कोशिका (cell) है।
और बढ़ना असल में क्या है? कोशिकाओं (cells) का बढ़ना और बँटते जाना।
- चोट लगने पर खाल अपने आप भर जाती है — वहाँ नई कोशिकाएँ (cells) बन जाती हैं
- टूटी हड्डी भी इसी तरह जुड़ जाती है
सारे जीवों में सबसे बड़ा बँटवारा यही है। और उसकी जड़ में सिर्फ़ एक सवाल है — खाना कहाँ से आता है।
- वे धूप, हवा और पानी से खुद अपना खाना बना लेते हैं — इसी को प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) कहते हैं
- इसलिए उन्हें कहीं जाने की ज़रूरत ही नहीं
- वे एक जगह जमे रहते हैं और जड़ें गहरी करते जाते हैं
- वे अपना खाना खुद नहीं बना सकते
- इसलिए उन्हें उठकर खाना ढूँढने जाना पड़ता है
- और यहीं से बाकी सब आया — टाँगें, पंख, आँखें, कान, दिमाग़
जानवर की लगभग हर ख़ूबी इसी एक मजबूरी से निकली है।
जानवरों की दुनिया बहुत बड़ी है — ज़मीन पर, पानी में और हवा में।
- हाथी और चींटी — दोनों जानवर, आकार में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़
- मछली पानी में साँस लेती है, चील हवा में उड़ती है, केंचुआ मिट्टी के अंदर रहता है
- पर ये सब वही सातों काम करते हैं जो हमने अभी देखे
सूखे पत्ते वाले सवाल में एक बात खुली थी: दुनिया दो हिस्सों में नहीं, तीन में बँटती है।
दो नहीं, तीन ख़ाने — और तीसरा सबसे कम ध्यान खींचता है।
तीसरे ख़ाने पर ग़ौर कीजिए। ये चीज़ें आज निर्जीव हैं, पर कभी किसी जीव का हिस्सा थीं।
- कुर्सी की लकड़ी कभी पेड़ का ज़िंदा तना थी
- सूती कपड़ा कभी खेत में खड़ा कपास का पौधा था
- चमड़ा कभी किसी जानवर की खाल था
- कागज़ भी लकड़ी से ही बनता है
और सबसे हैरान करने वाला है कोयला। वह करोड़ों साल पहले के जंगलों से बना है — ज़मीन के नीचे दबे हुए पेड़।
यानी चूल्हे में कोयला जलाते समय हम असल में बहुत पुरानी धूप जला रहे होते हैं।
ज़िंदा शरीर हर वक़्त अपनी मरम्मत करता रहता है। यह काम कभी रुकता नहीं।
- कटी उँगली कुछ दिनों में भर जाती है
- टूटी हड्डी अपने आप जुड़ जाती है
- रोज़ पुरानी कोशिकाएँ (cells) ख़त्म होती हैं और नई बनती रहती हैं
पर उम्र के साथ यह मरम्मत धीमी पड़ती जाती है। यही बूढ़ा होना है।
- बच्चे की चोट जल्दी भरती है, बुज़ुर्ग की देर से
- बाल सफ़ेद होने लगते हैं, हड्डियाँ कमज़ोर पड़ जाती हैं
- आँख और कान पहले जैसा काम नहीं करते
हर जीव को कितना वक़्त मिलता है, यह अलग-अलग होता है।
कुछ हफ़्तों से लेकर सैकड़ों साल तक — पर सबका अंत एक ही है।
पत्थर कभी नहीं मरता, क्योंकि वह कभी ज़िंदा था ही नहीं। मरना ज़िंदा होने की क़ीमत है।
और मरने के बाद भी कुछ ख़त्म नहीं होता।
- मरे हुए जीव मिट्टी में मिल जाते हैं
- पौधे उसी मिट्टी से अपना शरीर बनाते हैं
- जानवर वही पौधे खाते हैं
एक जीव का अंत दूसरे जीव की शुरुआत बन जाता है।
इसीलिए जीव मरते रहते हैं, पर ज़िंदगी चलती रहती है।
पूरा पाठ — एक नज़र में: ज़िंदा होना यानी बाहर से लेकर खुद को बनाना, और अपने जैसे नए छोड़ जाना।
1"जो हिलता है वह ज़िंदा है" — यह पहचान क्यों काम नहीं करती?▾
2ज़िंदा होने की दो सबसे गहरी पहचानें कौन-सी हैं?▾
3आग ज़िंदा क्यों नहीं है?▾
4सोया हुआ बीज ज़िंदा कैसे है, जब वह कुछ करता ही नहीं?▾
5आपका शरीर किन चीज़ों से बना है?▾
6कोशिका (cell) क्या है?▾
7जानवरों के पास टाँगें, आँखें और कान क्यों हैं, पौधों के पास नहीं?▾
8लकड़ी की कुर्सी किस ख़ाने में आएगी?▾
9बूढ़ा होना असल में क्या है?▾
10पत्थर कभी मरता क्यों नहीं?▾
ज़िंदगी की कहानी — बड़ी बातें
1. कोई एक पहचान ज़िंदगी को नहीं पकड़ती — न हिलना, न बढ़ना, न मरना।
2. सबसे गहरी पहचान यह है कि जीव बाहर से कुछ लेते हैं और उसी से अपना शरीर बनाते हैं।
3. दूसरी यह कि वे अपने जैसे नए जीव बनाते हैं — और नक़ल हर बार सटीक होती है।
4. दुनिया तीन ख़ानों में बँटी है: कभी ज़िंदा नहीं थीं, अभी ज़िंदा हैं, और कभी ज़िंदा थीं।
और यह सबसे सुंदर बात: आपके शरीर का हर हिस्सा कभी मिट्टी, पानी और हवा था। आप उन्हीं चीज़ों से बने हैं जिनसे यह पूरी दुनिया बनी है — बस आपमें वह सब ज़िंदा हो उठा है।