एक पल रुकिए और सोचिए —
- पेंसिल, मनुष्य, पत्ता, फल, मोबाइल फ़ोन — इनमें से किसमें पानी नहीं है?
- अपनी हथेली एक ठंडे शीशे या आईने के सामने रखकर ज़ोर से साँस छोड़िए — क्या दिखता है?
- एक कटोरे में हरे पत्ते, दूसरे में पत्थर रखकर कुछ दिन धूप में छोड़ दीजिए — फ़र्क याद रखिए।
इन तीनों में एक ही जवाब छिपा है — पानी सिर्फ़ गिलास में नहीं, हर जीवित चीज़ के अंदर भी है।
हम रोज़ पानी पीते हैं, नहाते हैं, कपड़े धोते हैं — पर पानी सिर्फ़ इतना ही नहीं है। पानी हमारे शरीर के अंदर है, पौधों के अंदर है, बादलों में है, और ज़मीन के नीचे भी छिपा है। आइए एक-एक करके देखें कि पानी कहाँ-कहाँ है, और इसकी कुछ खास बातें क्या हैं।
एक कटोरे में कुछ हरे पत्ते रखिए। दूसरे कटोरे में कुछ पत्थर रखिए। दोनों को 3–4 दिनों तक धूप में रहने दीजिए। क्या होगा? पत्ते सूखकर सिकुड़ जाएँगे, पर पत्थरों में बहुत कम बदलाव दिखेगा।
ऐसा क्यों हुआ? पत्तों के अंदर पानी होता है। धूप में वह पानी धीरे-धीरे बाहर निकल जाता है, इसलिए पत्ते सिकुड़ जाते हैं। पत्थरों में पानी लगभग होता ही नहीं, इसलिए उनमें कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता।
मनुष्य, जानवर, पौधे, फल, सब्ज़ियाँ, दूध और मिट्टी — इन सबके अंदर पानी होता है। पर पत्थर, धातु, प्लास्टिक, काँच और मोबाइल फ़ोन जैसी चीज़ों में बहुत कम या बिल्कुल पानी नहीं होता।
कोई भी जीवित चीज़ ऐसी नहीं है जिसमें पानी बिल्कुल न हो। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी पर सबसे पहला जीवन पानी में ही शुरू हुआ था — शायद यही कारण है कि आज भी हर जीवित चीज़ के अंदर पानी पाया जाता है। पानी सिर्फ़ पीने के लिए नहीं है — यह शरीर के अंदर भोजन पहुँचाने, तापमान (temperature) को नियंत्रित करने और पौधों को बढ़ने में मदद करता है।
हमारा शरीर भी उन चीज़ों में से एक है जिनमें बहुत सारा पानी होता है — हमारे शरीर का लगभग 60% भाग पानी से बना है।
दिमाग में लगभग 73% पानी होता है, खून में लगभग 90%, मांसपेशियों (muscles) में लगभग 75%, और हड्डियों में भी लगभग 31% पानी होता है। खून पानी जैसा तरल है जो शरीर के हर हिस्से तक भोजन और ऑक्सीजन (oxygen) पहुँचाता है। आँखों में भी पानी की एक पतली परत होती है, इसी से आँखें नम रहती हैं। पसीना भी शरीर के अंदर के पानी से ही बनता है।
किसी ठंडे शीशे (आईने) के सामने ज़ोर से साँस छोड़िए, जैसे "हा" बोलते हुए। शीशे पर हल्की सी धुंध जम जाएगी।
हमारी साँस के अंदर पानी की बहुत छोटी-छोटी बूंदें — जलवाष्प (water vapour) — होती हैं। जब यह गर्म साँस ठंडे शीशे से टकराती है, तो पानी की बूंदें बनकर शीशे पर जम जाती हैं। इससे पता चलता है कि हमारे शरीर के अंदर से भी पानी लगातार बाहर निकलता रहता है — पसीने, पेशाब, साँस और आँसुओं के रूप में। अगर शरीर से बहुत ज़्यादा पानी निकल जाए, तो शरीर में पानी की कमी हो जाती है, जिसे डिहाइड्रेशन (dehydration) कहते हैं — इसीलिए गर्मी में ज़्यादा पानी पीना ज़रूरी है।
जिस तरह हमारे शरीर को पानी चाहिए, उसी तरह पौधों को भी पानी की ज़रूरत होती है। पानी पौधे की जड़ों (roots) से लेकर पत्तियों तक भोजन के लिए ज़रूरी चीज़ें पहुँचाता है, और पानी की वजह से ही पौधा सीधा व तना हुआ खड़ा रह पाता है — बिना पानी के पौधा मुरझा जाता है।
एक सफ़ेद फूल या पत्तेदार डंठल लीजिए। एक गिलास पानी में थोड़ा खाने वाला रंग मिलाइए। डंठल को उस रंगीन पानी में रखकर कुछ घंटे छोड़ दीजिए — फूल की पंखुड़ियों पर धीरे-धीरे रंग दिखने लगेगा।
डंठल के अंदर बहुत पतली-पतली नलियाँ होती हैं। पानी इन्हीं नलियों से होकर नीचे से ऊपर की ओर चढ़ता है और पूरे पौधे में फैल जाता है। रंगीन पानी के साथ यही रंग पंखुड़ियों तक पहुँच गया — जिससे हमें पानी का यह सफ़र आँखों से दिखाई दे गया।
पानी का सफ़र: जड़ें ज़मीन से पानी सोखती हैं → तने की पतली नलियों से ऊपर चढ़ता है → पत्तियों तक पहुँचकर, धूप की मदद से भोजन बनाने में काम आता है।
अगर पौधे को कई दिनों तक पानी न मिले, तो पत्तियाँ झुक जाती हैं और पौधा मुरझाने लगता है। सभी पौधों को बराबर पानी नहीं चाहिए — कैक्टस जैसे पौधों को बहुत कम पानी चाहिए, जबकि धान जैसी फ़सलों को बहुत ज़्यादा।
पृथ्वी को "नीला ग्रह" भी कहा जाता है, क्योंकि इसके ऊपर का बड़ा हिस्सा पानी से ढका हुआ है। समुद्र में पृथ्वी के पानी का सबसे बड़ा हिस्सा है। नदियाँ पहाड़ों से निकलकर मैदानों से होते हुए समुद्र तक जाती हैं, झीलें एक जगह रुका हुआ बड़ा जलाशय हैं, और भूजल (groundwater) ज़मीन के अंदर गहराई में मौजूद पानी है, जिसे हम कुएँ या हैंडपंप से निकालते हैं।
समुद्र का पानी खारा (नमकीन) होता है, इसीलिए इसे सीधे पिया नहीं जा सकता। नदियों, झीलों और भूजल (groundwater) का पानी मीठा होता है, इसे पिया जा सकता है। हमारे घर तक जो पानी नल, कुएँ या हैंडपंप से आता है, वह ज़्यादातर भूजल (groundwater) से आता है।
अगर पृथ्वी के सारे पानी को 100 गिलास पानी मान लें, तो इनमें से कितने गिलास पीने लायक मीठा पानी होंगे?
पृथ्वी पर पानी तो बहुत है, पर उसका ज़्यादातर हिस्सा खारा है या बर्फ बनकर जमा हुआ है — असल में इस्तेमाल लायक मीठा पानी बहुत कम बचता है।
समुद्र का पानी सिर्फ़ उबालने से नहीं पिया जा सकता — उबालने से नमक नहीं निकलता। नमक हटाने के लिए एक खास तरीके, डिसैलिनेशन (desalination), की ज़रूरत पड़ती है। और भूजल (groundwater) भी कभी खत्म हो सकता है — अगर हम ज़रूरत से ज़्यादा भूजल (groundwater) निकालते रहें और उसे दोबारा भरने का मौका न दें, तो भूजल (groundwater) का स्तर लगातार नीचे गिर सकता है।
पानी कोई भी एक तय आकार नहीं रखता — वह जिस बर्तन में डाला जाए, उसी का आकार ले लेता है।
एक ही मात्रा में पानी लीजिए। इसे बारी-बारी से एक गिलास, एक चपटी थाली, और एक लंबी बोतल में डालिए — हर बार पानी का आकार बदल जाएगा, पर मात्रा वही रहेगी।
तीनों में पानी की मात्रा बराबर है — बस आकार बदल गया, क्योंकि पानी के कण (particles) एक-दूसरे से फिसल सकते हैं और बर्तन का आकार ले लेते हैं।
पानी हमेशा ऊँचाई से नीचे की ओर बहता है, कभी अपने आप ऊपर नहीं बहता। ऐसा पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण (gravity) की वजह से होता है — गुरुत्वाकर्षण (gravity) हर चीज़ को नीचे की तरफ़ खींचता है। पानी हल्का और बहने वाला होने के कारण आसानी से इस खिंचाव के साथ बह जाता है, और हमेशा सबसे नीचे व सबसे आसान रास्ता खोज लेता है — नदी भी इसीलिए हमेशा पहाड़ों से मैदानों की ओर, और आखिर में समुद्र में जाकर मिलती है। पानी को ऊपर की ओर भेजना अपने आप नामुमकिन है, पर मशीन (जैसे पंप) की मदद से हम इसे ज़बरदस्ती ऊपर भी भेज सकते हैं — जैसे घर की टंकी तक पानी चढ़ाया जाता है।
पानी धरती पर एक ही जगह नहीं रुकता — यह लगातार एक चक्र में घूमता रहता है। समुद्र से हवा में, हवा से बादल में, बादल से बारिश में, और बारिश से फिर नदी-समुद्र में। इसे जल चक्र (water cycle) कहते हैं।
एक कटोरे में थोड़ा पानी भरकर उसके ऊपर एक प्लास्टिक शीट से ढक दीजिए, और कुछ घंटे तेज़ धूप में रखिए। ढकने वाली शीट के नीचे पानी की छोटी-छोटी बूंदें जमा होती दिखेंगी — बिल्कुल वैसे ही जैसे बादल बनते हैं।
जल चक्र के चार चरण — वाष्पीकरण (evaporation), संघनन (condensation), वर्षा (precipitation) और संग्रह (collection) — बार-बार दोहराते रहते हैं।
बारिश का सारा पानी नदी-समुद्र में ही नहीं जाता — कुछ पानी ज़मीन में रिसकर भूजल (groundwater) भी बन जाता है, और कुछ पौधे सोख लेते हैं।
हमने देखा कि पीने लायक मीठा पानी असल में बहुत कम है। पानी के बिना न इंसान जी सकता है, न जानवर, न पौधे — इसीलिए इसे बचाकर, सोच-समझकर इस्तेमाल करना बहुत ज़रूरी है।
पीने और खाना बनाने में, नहाने और कपड़े धोने में, खेतों की सिंचाई (irrigation) में, और कारखानों में चीज़ें बनाने में — हर जगह पानी चाहिए।
ब्रश करते समय नल खुला न छोड़ें, टपकते नल को जल्दी ठीक करवाएँ, नहाने में बाल्टी का इस्तेमाल करें और जितनी ज़रूरत हो उतना ही पानी लें, और बर्तन धोते समय नल लगातार खुला न रखें। पानी बचाना सिर्फ़ बड़ों का काम नहीं — हर कोई, बच्चे भी, रोज़ाना छोटी-छोटी आदतों से पानी बचा सकते हैं। अगर हम पानी बचाना बंद कर दें, तो पीने लायक पानी और कम होता जाएगा, और आने वाले समय में पानी की कमी और बढ़ सकती है।
पूरा पाठ — एक नज़र में: पानी हर जगह है, पर पीने लायक बहुत कम — इसीलिए इसे समझदारी से बचाना ज़रूरी है।
1क्या कोई ऐसी जीवित चीज़ है जिसमें पानी न हो?▾
2अगर शरीर से बहुत ज़्यादा पानी निकल जाए तो क्या होगा?▾
3पौधे में पानी जड़ों से पत्तियों तक कैसे पहुँचता है?▾
4पृथ्वी पर इतना पानी है, फिर भी पीने लायक पानी कम क्यों है?▾
5क्या समुद्र का पानी उबालकर पिया जा सकता है?▾
6पानी अपना आकार क्यों बदल लेता है?▾
7पानी हमेशा नीचे की ओर ही क्यों बहता है?▾
8जल चक्र के चार चरण कौन-से हैं?▾
9क्या बारिश का सारा पानी नदी-समुद्र में ही जाता है?▾
10क्या पानी बचाना सिर्फ़ बड़ों का काम है?▾
पानी की कहानी — बड़ी बातें
1. पानी सिर्फ़ गिलास में नहीं है — यह हमारे शरीर, पौधों, मिट्टी और हवा में भी है। हर जीवित चीज़ के अंदर पानी होता है।
2. पृथ्वी पर पानी बहुत है, पर पीने लायक मीठा पानी बहुत कम — ज़्यादातर पानी समुद्र का खारा पानी है या बर्फ बनकर जमा है।
3. पानी अपना आकार बदल लेता है और हमेशा नीचे की ओर बहता है — गुरुत्वाकर्षण (gravity) के कारण।
और यह सबसे सुंदर बात: पानी कभी खत्म नहीं होता, बस अपना रूप बदलकर जल चक्र (water cycle) में लगातार घूमता रहता है — भाप, बादल, बारिश और फिर नदी-समुद्र। इसीलिए इसे बचाकर इस्तेमाल करना हम सबकी ज़िम्मेदारी है।