दिन-रात बिना सोचे हम साँस लेते रहते हैं। पर ज़रा साँस रोककर देखो — कुछ ही पल में बेचैनी होने लगती है। आख़िर शरीर को हवा की इतनी ज़रूरत क्यों है? चलो सीढ़ी चढ़ें।
हर पायदान पर टैप करो। अपनी कक्षा तक चढ़ो, और जितना समझ आए उतना आगे।
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कक्षा 5–6 तकसाँस यानी हवा अंदर-बाहर▾ टैप करके खोलें
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हम नाक से हवा अंदर खींचते हैं और फिर बाहर छोड़ते हैं — यही साँस लेना है। अंदर जाने वाली हवा में ऑक्सीजन (oxygen) होती है, जो हमारे शरीर को हर पल चाहिए। बाहर छोड़ी हवा में कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) ज़्यादा होती है — यह शरीर की "कचरा गैस" है।
यह हवा छाती में बने दो नरम अंगों — फेफड़ों (lungs) — तक जाती है। फेफड़े गुब्बारे की तरह फूलते और पिचकते रहते हैं।
चलने-दौड़ने की ताकत हमें खाने से मिलती है। पर खाने से ताकत निकालने के लिए ऑक्सीजन ज़रूरी है — ठीक वैसे ही जैसे आग जलने के लिए हवा चाहिए। इसीलिए साँस रोकते ही कुछ पलों में बेचैनी होने लगती है।
कक्षा 6 के लिए इतना समझना बहुत बढ़िया है।
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कक्षा 9 तकऑक्सीजन, खून और श्वसन▾ टैप करके खोलें
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फेफड़ों के अंदर हवा बहुत नन्ही थैलियों — वायुकोष (alveoli) — तक पहुँचती है। यहीं ऑक्सीजन खून (blood) में घुल जाती है, और कार्बन डाइऑक्साइड खून से निकलकर साँस के साथ बाहर चली जाती है।
खून इस ऑक्सीजन को शरीर की हर कोशिका (cell) तक पहुँचाता है।
कोशिका के अंदर ऑक्सीजन भोजन (ग्लूकोज़) को धीरे-धीरे "जलाकर" ऊर्जा निकालती है। इसी क्रिया को श्वसन (respiration) कहते हैं — यह एक धीमी और नियंत्रित "आग" है।
ध्यान दो — साँस लेना (breathing) और श्वसन (respiration) अलग बातें हैं: साँस लेना यानी हवा अंदर-बाहर करना; श्वसन यानी कोशिका के अंदर ऊर्जा बनाना।
ऑक्सीजन हो तो ज़्यादा ऊर्जा बनती है (वायुजीवी श्वसन / aerobic)। बहुत तेज़ दौड़ने पर जब ऑक्सीजन कम पड़ती है, तो माँसपेशियाँ बिना ऑक्सीजन के थोड़ी ऊर्जा बनाती हैं (अवायुजीवी / anaerobic), जिससे लैक्टिक अम्ल (lactic acid) बनता है और अकड़न/दर्द होता है।
कक्षा 9 बोर्ड स्तर के लिए जवाब पूरा है।
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कक्षा 12 तकश्वसन तंत्र और गैसों का आदान-प्रदान▾ टैप करके खोलें
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हवा का रास्ता: नाक → श्वासनली (trachea) → दो श्वसनी (bronchi) → फेफड़े → वायुकोष (alveoli)।
साँस लेने की क्रिया डायाफ्राम (diaphragm) और पसलियों की माँसपेशियों से होती है — ये सिकुड़कर छाती बड़ी करते हैं तो हवा अंदर खिंचती है, और ढीले होकर हवा बाहर निकालते हैं।
वायुकोष और खून के बीच गैसों का आदान-प्रदान विसरण (diffusion) से होता है — ऑक्सीजन ज़्यादा सांद्रता से कम की ओर (हवा से खून में), और कार्बन डाइऑक्साइड उल्टी दिशा में।
खून में ऑक्सीजन को एक ख़ास लाल पदार्थ — हीमोग्लोबिन (haemoglobin) — पकड़कर पूरे शरीर में ले जाता है।
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प्रतियोगी परीक्षाकोशिकीय श्वसन की गहराई▾ टैप करके खोलें
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कोशिकीय श्वसन तीन चरणों में होता है: ग्लाइकोलाइसिस (glycolysis) — कोशिकाद्रव्य में ग्लूकोज़ टूटकर पाइरुवेट बनता है (2 ATP); फिर क्रेब्स चक्र (Krebs cycle) — माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) में; और अंत में इलेक्ट्रॉन परिवहन शृंखला (ETC) — जहाँ सबसे ज़्यादा ATP बनती है।
ऑक्सीजन ETC में अंतिम इलेक्ट्रॉन ग्राही (final electron acceptor) है — यानी ऑक्सीजन न हो तो यह शृंखला रुक जाती है और ATP बनना लगभग ठप। इसीलिए हमें लगातार साँस चाहिए।
ऑक्सीजन के बिना (अवायुजीवी श्वसन / किण्वन / fermentation) सिर्फ 2 ATP मिलती है — मनुष्य की माँसपेशी में लैक्टिक अम्ल, और यीस्ट में एथेनॉल बनता है।
माइटोकॉन्ड्रिया को "कोशिका का बिजलीघर (powerhouse)" कहते हैं, क्योंकि क्रेब्स चक्र और ETC यहीं चलते हैं और अधिकांश ATP यहीं बनती है।
💡 यही ज्ञान और सवाल भी सुलझाता है
एक साँस, पूरी ऊर्जा-मशीन
हम साँस इसलिए लेते हैं ताकि ऑक्सीजन हर कोशिका तक पहुँचे और भोजन से ATP (ऊर्जा) बने। एक छोटा-सा सवाल — "हम साँस क्यों लेते हैं" — और पीछे पूरी जीव-विज्ञान खुल गई।