एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीजिए। अब आपको कुछ दिखाई नहीं दे रहा। आँखें तो हैं, सामने चीज़ें भी हैं — फिर क्या कमी है?
और सोचिए — रात को बिजली चली जाए और कमरा पूरी तरह अँधेरा हो, तो सामने रखी किताब भी नहीं दिखती। किसी चीज़ को देखने के लिए तीन चीज़ें चाहिए: आँखें, वह वस्तु (object), और सबसे ज़रूरी — रोशनी (light)।
आज हम इन्हीं रोज़मर्रा के सवालों के जवाब खोजेंगे — और समझेंगे कि आखिर रोशनी (light) है क्या।
रोशनी (light) के बिना आँखें बेकार हैं। लेकिन यह रोशनी आती कहाँ से है, और हमें चीज़ें दिखाती कैसे है? एक-एक करके देखते हैं।
कुछ चीज़ें अपनी रोशनी खुद बनाती हैं — जैसे सूरज, जलता हुआ बल्ब, और जलती हुई मोमबत्ती। जो चीज़ अपनी रोशनी खुद निकालती है, उसे प्रकाश स्रोत (light source) कहते हैं।
लेकिन एक गेंद, एक किताब या एक पत्थर अपनी रोशनी खुद नहीं बनाते। यहाँ तक कि चाँद भी अपनी रोशनी नहीं बनाता — वह सूरज की रोशनी को वापस भेजता है, इसलिए चमकता दिखता है। तो फिर ये चीज़ें, जो खुद प्रकाश स्रोत (light source) नहीं हैं, हमें दिखाई कैसे देती हैं?
इसका जवाब बहुत सुंदर है। किसी प्रकाश स्रोत (light source) — जैसे बल्ब या सूरज — से रोशनी निकलकर गेंद पर पड़ती है। फिर वह रोशनी गेंद से टकराकर वापस चारों ओर फैल जाती है। रोशनी के इस तरह टकराकर वापस लौटने को परावर्तन (reflection) कहते हैं।
इस परावर्तित (reflected) रोशनी का कुछ हिस्सा हमारी आँखों तक पहुँचता है — और तभी हमें गेंद दिखाई देती है। यानी हम किसी वस्तु (object) को तब देखते हैं, जब उससे परावर्तित (reflected) रोशनी हमारी आँखों तक पहुँचती है।
प्रकाश स्रोत (light source) → रोशनी वस्तु (object) पर पड़ती है → वहाँ से परावर्तित (reflected) होकर आँख तक पहुँचती है।
शीशा और दीवार, दोनों रोशनी को परावर्तित (reflect) करते हैं। फिर शीशे में तो हमें अपना पूरा चेहरा दिखाई देता है, पर दीवार में क्यों नहीं?
फर्क सतह का है। शीशे की सतह बहुत चिकनी होती है। हमारे माथे, नाक, आँखों और मुँह से आने वाली रोशनी अलग-अलग दिशाओं से आती है, और चिकना शीशा इन दिशाओं को बिगाड़े बिना, व्यवस्थित ढंग से परावर्तित (reflect) कर देता है। इसलिए हमारा दिमाग उस रोशनी से चेहरे की पूरी तस्वीर — यानी प्रतिबिंब (image) — बना पाता है।
दीवार की सतह खुरदरी होती है। वह उसी रोशनी को अलग-अलग दिशाओं में बिखेर देती है। हमारी आँख तक पूरी और व्यवस्थित जानकारी नहीं पहुँचती, इसलिए दीवार में चेहरा नहीं बनता।
चिकनी सतह (शीशा) रोशनी को व्यवस्थित परावर्तित (reflect) करती है — चेहरा बनता है। खुरदरी सतह (दीवार) रोशनी बिखेर देती है — चेहरा नहीं बनता।
धूप में खड़े होकर ज़मीन पर अपनी छाया देखिए। अब अपना हाथ सूरज और ज़मीन के बीच रखिए — ज़मीन पर हाथ के आकार का एक काला हिस्सा बन जाता है। यह क्यों होता है?
क्योंकि रोशनी (light) हमेशा सीधी रेखा में चलती है। जब हमारा हाथ उसके रास्ते में आता है, तो वह रोशनी को आगे जाने से रोक देता है। हाथ के पीछे वाली जगह तक रोशनी नहीं पहुँच पाती — वहीं छाया (shadow) बन जाती है।
रोशनी सीधी चलती है। बीच में रखी वस्तु (object) उसका रास्ता रोकती है, और उसके पीछे छाया (shadow) बन जाती है।
एक टॉर्च की रोशनी साफ काँच, पतले कागज़ और पत्थर पर बारी-बारी डालकर देखिए। क्या रोशनी तीनों के आर-पार बराबर जाती है? नहीं — हर चीज़ रोशनी के साथ अलग बर्ताव करती है।
साफ काँच में से रोशनी आसानी से आर-पार चली जाती है, इसलिए उसके पार की चीज़ें साफ दिखती हैं। ऐसी चीज़ों को पारदर्शी (transparent) कहते हैं। पतले कागज़ या धुँधले काँच में से कुछ रोशनी पार होती है और कुछ बिखर जाती है — इन्हें अर्धपारदर्शी (translucent) कहते हैं; इनके पार की चीज़ें धुँधली दिखती हैं। और पत्थर या दीवार में से रोशनी बिल्कुल आर-पार नहीं जाती — इन्हें अपारदर्शी (opaque) कहते हैं, और इन्हीं के पीछे साफ छाया (shadow) बनती है।
पारदर्शी (transparent): सारी रोशनी पार · अर्धपारदर्शी (translucent): कुछ रोशनी पार · अपारदर्शी (opaque): रोशनी रुक जाती है।
एक गिलास में पानी भरकर उसमें एक सीधा चम्मच डालिए। चम्मच वास्तव में टेढ़ा नहीं है — फिर पानी की सतह पर वह मुड़ा हुआ क्यों दिखता है?
पानी में रखा सीधा चम्मच सतह पर मुड़ा हुआ दिखाई देता है।
हवा में रोशनी सीधी चलती है, और पानी में भी सीधी चलती है। लेकिन जब रोशनी एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ में जाती है — जैसे पानी से हवा में — तो उसकी दिशा थोड़ी बदल सकती है। रोशनी के इस तरह मुड़ने को अपवर्तन (refraction) कहते हैं।
इसी अपवर्तन (refraction) के कारण पानी के अंदर का चम्मच हमें अपनी असली जगह से थोड़ा हटकर, और सतह पर मुड़ा हुआ दिखाई देता है।
पानी के अंदर से आती रोशनी सतह पर मुड़ जाती है (ठोस रेखा)। आँख उसे सीधा मानती है (टूटी रेखा), इसलिए वस्तु ऊँची और अलग जगह दिखती है।
हमारी आँख एक बात हमेशा मान लेती है: कि रोशनी उसी दिशा से सीधी आई है, जिस दिशा से वह आँख में पहुँची। ज़्यादातर समय यह सही होता है — पर जब रोशनी बीच में मुड़ जाए, तब आँख धोखा खा जाती है।
इसीलिए पानी में तैरती मछली अपनी असली जगह से थोड़ा हटकर दिखती है। मछली से आई रोशनी पानी की सतह पर मुड़ जाती है (अपवर्तन / refraction), पर हमारी आँख उसे सीधा मानकर मछली को कहीं और मान लेती है। मछुआरे को इसीलिए सीधे दिखती जगह पर नहीं, बल्कि थोड़ा नीचे निशाना लगाना पड़ता है।
मछली की असली जगह और दिखने वाली जगह अलग है — क्योंकि रोशनी सतह पर मुड़ जाती है।
यही बात शीशे में भी होती है। शीशे में देखकर लगता है जैसे हमारा चेहरा शीशे के पीछे हो — जबकि वहाँ कुछ नहीं होता। चेहरे से आई रोशनी शीशे से टकराकर हमारी आँख तक आती है, और आँख उस रास्ते को पीछे की ओर सीधा मानकर तस्वीर वहाँ बना देती है।
पूरा पाठ एक नज़र में — रोशनी हमें कैसे दिखाती है, वह सीधी चलती है, हर चीज़ के साथ अलग बर्ताव करती है, और मुड़ भी सकती है।
1अँधेरे कमरे में सामने रखी चीज़ क्यों नहीं दिखती?▾
2सूरज और चाँद, दोनों चमकते हैं — फिर इनमें फर्क क्या है?▾
3गेंद खुद रोशनी नहीं बनाती, फिर हमें दिखती कैसे है?▾
4शीशे में अपना चेहरा दिखता है, पर दीवार में नहीं — क्यों?▾
5किसी वस्तु के पीछे काली छाया क्यों बनती है?▾
6साफ काँच के आर-पार दिखता है, दीवार के पार क्यों नहीं?▾
7पानी में रखा सीधा चम्मच टेढ़ा क्यों दिखता है?▾
8मछली पकड़ते समय उसकी दिखने वाली जगह पर निशाना क्यों नहीं लगता?▾
रोशनी की कहानी — तीन बड़ी बातें
1. हम किसी वस्तु को तब देखते हैं जब उससे परावर्तित (reflected) रोशनी हमारी आँखों तक पहुँचती है। जो चीज़ें खुद रोशनी नहीं बनातीं, वे भी इसी तरह दिखती हैं।
2. रोशनी सीधी रेखा में चलती है — इसीलिए वस्तुओं के पीछे छाया (shadow) बनती है, और पारदर्शी (transparent) तथा अपारदर्शी (opaque) चीज़ें रोशनी के साथ अलग-अलग बर्ताव करती हैं।
3. एक पदार्थ से दूसरे में जाते समय रोशनी मुड़ जाती है (अपवर्तन / refraction) — इसीलिए पानी में चम्मच टेढ़ा दिखता है और आँख कभी-कभी धोखा खा जाती है।