एक पल रुकिए और सोचिए —
- एक खाली गिलास हाथ में लीजिए। क्या वो सच में खाली है?
- उसी गिलास को उल्टा करके पानी की बाल्टी में सीधा नीचे दबाइए — पानी अंदर क्यों नहीं भरता?
- एक कागज़ और एक कंकड़ एक साथ गिराइए — कौन पहले ज़मीन पर पहुँचता है?
तीनों का जवाब एक ही चीज़ में छिपा है — वो चीज़ जो दिखती नहीं, पर हर जगह है।
हम हवा को न देख सकते हैं, न पकड़ सकते हैं। फिर भी वह हर जगह है — कमरे में, खाली गिलास में, मिट्टी और पानी के अंदर भी। आइए देखें कि यह अनदेखी चीज़ है क्या।
एक खाली गिलास उल्टा करके पानी की बाल्टी में सीधा नीचे दबाइए — गिलास टेढ़ा न हो। अंदर पानी ऊपर तक नहीं चढ़ेगा। अब गिलास थोड़ा टेढ़ा कीजिए — बुलबुले निकलेंगे, और तभी पानी भरेगा।
गिलास खाली था ही नहीं। उसके अंदर हवा भरी थी। हवा भी जगह घेरती है — इसलिए पानी को अंदर आने की जगह ही नहीं मिली।
गिलास टेढ़ा करते ही हवा बुलबुले बनकर निकल गई, और उसकी खाली जगह में पानी भर गया।
उल्टे गिलास में पहले से हवा भरी है, इसलिए पानी ऊपर नहीं चढ़ पाता।
तो हवा "कुछ नहीं" नहीं है। वह असली चीज़ है — बस इतनी पतली और आर-पार दिखने वाली कि आँखें उसे पकड़ नहीं पातीं।
मछली पानी के समुद्र में रहती है। पानी उसे हर तरफ़ से घेरे रहता है, और शायद उसे पता भी नहीं चलता।
हमारे साथ भी यही होता है। हम हवा के एक समुद्र की तली पर रहते हैं। पक्षी उसमें तैरती मछलियों जैसे हैं।
दोनों समुद्रों की एक ऊपरी सतह है। मछली पानी में तैरती है, पक्षी हवा में — और हम सबसे नीचे, तली पर।
इस समुद्र की भी एक ऊपरी सतह है। पृथ्वी के चारों ओर हवा की एक पतली परत है — उससे ऊपर हवा है ही नहीं। चंद्रमा (moon) पर तो यह परत बिल्कुल नहीं है।
पृथ्वी के चारों ओर हवा की एक पतली परत — उससे आगे कुछ नहीं। चंद्रमा (moon) के पास यह परत है ही नहीं।
हवा का वज़न होता है। इस पूरे समुद्र का वज़न हम पर हर पल पड़ता है। इसी दबाव को वायुदाब (air pressure) कहते हैं। हमें यह महसूस नहीं होता, क्योंकि हम जन्म से इसी में हैं।
एक गिलास पानी से पूरा भरिए। उस पर मोटा कागज़ रखिए। कागज़ को हथेली से दबाकर गिलास उल्टा कीजिए, फिर हथेली हटा दीजिए। कागज़ चिपका रहेगा, पानी नहीं गिरेगा। (बाल्टी के ऊपर कीजिए।)
नीचे से हवा कागज़ को ऊपर दबा रही है, और यह दबाव पानी के वज़न से ज़्यादा है। वायुदाब (air pressure) हर तरफ़ से दबाता है — ऊपर से, नीचे से और बग़ल से।
स्ट्रॉ (straw) से पीते समय हम शरबत खींचते नहीं। हम स्ट्रॉ (straw) के अंदर की हवा बाहर निकालते हैं, और बाहर की हवा शरबत को ऊपर धकेल देती है।
हवा एक चीज़ नहीं — कई गैसों का मिश्रण (mixture) है। वे इतनी घुली-मिली हैं कि एक ही चीज़ जैसी लगती हैं।
एक साँस की हवा को 100 हिस्सों में बाँटिए: लगभग 78 हिस्से नाइट्रोजन (nitrogen), 21 हिस्से ऑक्सीजन (oxygen), और 1 से भी कम बाकी सब — कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide), जलवाष्प (water vapour) और धूल।
हवा में सबसे ज़्यादा नाइट्रोजन (nitrogen) है — ऑक्सीजन (oxygen) उससे काफ़ी कम।
हैरानी की बात यह है कि जिस ऑक्सीजन (oxygen) के बिना हम जी नहीं सकते, वह हवा का सबसे बड़ा हिस्सा नहीं है।
जलवाष्प (water vapour) की मात्रा मौसम के साथ बदलती है — बरसात में ज़्यादा। इसीलिए तब कपड़े देर से सूखते हैं।
हवा में से हमारे शरीर को सिर्फ़ ऑक्सीजन (oxygen) चाहिए। हम उसे रख लेते हैं और बदले में कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) छोड़ देते हैं।
चुपचाप बैठकर गिनिए कि एक मिनट में कितनी बार साँस लेते हैं। अब तेज़ दौड़कर आइए और तुरंत फिर गिनिए। दूसरी बार गिनती काफ़ी ज़्यादा होगी।
दौड़ते समय शरीर को ज़्यादा ऊर्जा चाहिए, और उसके लिए ज़्यादा ऑक्सीजन (oxygen)। इसलिए साँस अपने आप तेज़ हो जाती है।
फिर ऑक्सीजन (oxygen) कभी खत्म क्यों नहीं होती? क्योंकि पौधे उसे वापस लौटाते रहते हैं। धूप में वे कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) लेते हैं और ऑक्सीजन (oxygen) छोड़ते हैं — यही प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) है।
हम जो छोड़ते हैं, पौधे उसे लेते हैं — और जो पौधे छोड़ते हैं, वही हम लेते हैं।
इसीलिए पेड़ काटना सिर्फ़ छाया का नुकसान नहीं है।
एक मोमबत्ती जलाइए। उस पर काँच का गिलास उल्टा करके पूरी तरह ढक दीजिए। कुछ ही पलों में लौ अपने आप बुझ जाएगी। (किसी बड़े के साथ ही कीजिए।)
गिलास के अंदर की ऑक्सीजन (oxygen) खर्च हो गई, और बाहर से नई हवा अंदर आ नहीं पाई। आग को भी ऑक्सीजन (oxygen) चाहिए।
ढके हुए गिलास में ऑक्सीजन (oxygen) खर्च हो जाती है और लौ बुझ जाती है।
जलने के लिए तीन चीज़ें चाहिए: कोई जलने वाली चीज़, गर्मी, और ऑक्सीजन (oxygen)। इनमें से एक हटा दीजिए — आग बुझ जाएगी।
इसीलिए आग पर मोटा कपड़ा या रेत डालने से वह बुझ जाती है, और चूल्हे में फूँक मारने से तेज़ हो जाती है।
अब गौर कीजिए: साँस लेना और आग जलना एक ही तरह का काम है। दोनों में किसी चीज़ से ऊर्जा निकाली जाती है — आग तेज़ी से करती है, हमारा शरीर धीरे-धीरे।
गुब्बारा ऊपर चला जाता है, पर पंख नीचे ही आता है। यहाँ दो अलग बातें हो रही हैं — इन्हें मिलाना नहीं चाहिए।
जैसे पानी हल्की चीज़ों को ऊपर धकेलता है, वैसे ही हवा भी धकेलती है। जो चीज़ उतनी ही जगह की हवा से हल्की है, हवा उसे ऊपर उठा देती है — गैस वाला गुब्बारा, धुआँ, गरम हवा।
पंख हवा से कहीं भारी है, इसलिए वह गिरता ही है। पर धीरे — क्योंकि उसे गिरते समय रास्ते की हवा हटानी पड़ती है। हवा के इस रोकने को वायु प्रतिरोध (air resistance) कहते हैं।
कागज़, पत्ता और पैराशूट (parachute) भी इसी वजह से धीरे गिरते हैं। यानी पंख हवा पर तैरता नहीं — वह गिर ही रहा होता है, बस धीरे।
ऊपर उठना और धीरे गिरना — दो अलग बातें हैं, एक नहीं।
एक कागज़ और एक कंकड़ एक साथ गिराइए — कंकड़ पहले पहुँचेगा। अब उसी कागज़ को कसकर मोड़कर छोटी गेंद बना लीजिए और फिर गिराइए। इस बार दोनों लगभग साथ पहुँचेंगे।
कागज़ का वज़न नहीं बदला — सिर्फ़ चौड़ाई बदली। चौड़ा कागज़ ज़्यादा हवा हटाता है, इसलिए धीरे गिरता है।
और जहाँ हवा ही न हो? चंद्रमा (moon) पर अंतरिक्ष यात्रियों (astronauts) ने हथौड़ा और पंख एक साथ छोड़े — दोनों एक ही पल में नीचे पहुँचे। गुरुत्वाकर्षण (gravity) हर चीज़ को एक जैसा खींचता है; फ़र्क़ सिर्फ़ हवा बनाती है।
हवा एक जगह टिकी नहीं रहती। चलती हुई हवा को पवन (wind) कहते हैं। पर उसे चलाता कौन है? जवाब है सूरज।
दिन में सूरज ज़मीन को पानी से जल्दी गरम कर देता है। ज़मीन के ऊपर की हवा गरम होकर हल्की हो जाती है और ऊपर उठ जाती है।
उसकी खाली जगह भरने के लिए पानी के ऊपर की ठंडी हवा ज़मीन की तरफ़ बहने लगती है। हवा का यही बहना पवन (wind) है।
गरम हवा ऊपर, और उसकी खाली जगह भरने ठंडी हवा किनारे की तरफ़ — यही हवा चलना है।
इसीलिए किनारे पर दिन में ठंडी हवा पानी की तरफ़ से आती है, चूल्हे का धुआँ सीधा ऊपर जाता है, और पतंग हवा में टिकी रहती है।
पर गरम हवा हल्की क्यों हो जाती है? यही सवाल हमें अगले पाठ तक ले जाएगा।
हवा हमें ज़िंदा रखती है — पर वही हवा गंदी भी हो सकती है। जब उसमें धुआँ, धूल और नुक़सान करने वाली गैसें मिल जाएँ, तो उसे हवा का प्रदूषण (air pollution) कहते हैं।
गाड़ियों और कारखानों का धुआँ, कूड़ा और पराली जलाना, चूल्हे का धुआँ और सड़कों की धूल — ये सबसे बड़े कारण हैं।
गंदी हवा से खाँसी, आँखों में जलन और दमा (asthma) जैसी बीमारियाँ होती हैं। बच्चों और बुज़ुर्गों पर असर सबसे ज़्यादा पड़ता है।
हवा साफ़ रखने का सबसे भरोसेमंद तरीका पेड़ हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) लेते हैं, ऑक्सीजन (oxygen) छोड़ते हैं, और पत्तियों पर धूल भी रोक लेते हैं।
पूरा पाठ — एक नज़र में: हवा दिखती नहीं, पर वह जगह घेरती है, वज़न रखती है, हमें जिलाती है और चलती भी रहती है।
1उल्टे गिलास को पानी में दबाने पर पानी अंदर क्यों नहीं भरता?▾
2क्या हवा का वज़न होता है?▾
3स्ट्रॉ से शरबत ऊपर कैसे आ जाता है?▾
4हवा में सबसे ज़्यादा कौन-सी गैस है?▾
5मोमबत्ती को गिलास से ढकने पर लौ क्यों बुझ जाती है?▾
6गुब्बारा ऊपर उठता है, पर पंख नीचे क्यों गिरता है?▾
7कागज़ को मोड़कर गेंद बना देने पर वह तेज़ क्यों गिरता है?▾
8चंद्रमा पर हथौड़ा और पंख एक साथ क्यों गिरे?▾
9हवा चलती क्यों है?▾
10हवा साफ़ रखने में पेड़ कैसे मदद करते हैं?▾
हवा की कहानी — बड़ी बातें
1. हवा दिखती नहीं, पर वह असली है — जगह घेरती है और उसका वज़न भी होता है।
2. हम हवा के एक समुद्र की तली पर रहते हैं। उसका दबाव — वायुदाब (air pressure) — हर तरफ़ से बराबर पड़ता है।
3. हवा कई गैसों का मिश्रण (mixture) है। साँस लेना और आग जलना, दोनों को ऑक्सीजन (oxygen) चाहिए।
4. हल्का ऊपर उठता है, भारी गिरता है — और चौड़ी हल्की चीज़ें वायु प्रतिरोध (air resistance) से धीरे गिरती हैं।
और यह सबसे सुंदर बात: जिसे हम देख भी नहीं सकते, वही हमें ज़िंदा रखती है, आग जलाती है और पतंग उड़ाती है। सबसे ज़रूरी चीज़ें अक्सर सबसे कम दिखाई देती हैं।